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ब्राह्मण की असहनीय दशा/Unbearable condition of Brahmin
ब्राह्मण की असहनीय दशा/Unbearable condition of Brahmin
प्रिय स्नेही मित्रों जय श्रीकृष्णा, राधे राधे।कोरोना काल मे एक ब्राह्मण की असहनीय दशा को पूरा पढ़ें, और विचार करें ।
पंडित जी को सर पर टोकरी उठाएं सब्जी बेचते देखा तो आंखें फटी रह गई।
पंडित रामसरन तिवारी जैसा विद्वान ढूंढें न मिले। काशी से आचार्य किया, सरकार की चाकरी करना उचित नहीं समझा। निःस्वार्थ भाव से कर्मकांड व धर्मोपदेश करने लगे। उससे प्राप्त अर्थ से दैनिक जीवन संपादित करने लगे।
ब्राह्मण की असहनीय दशा/Unbearable condition of Brahmin
घर में पंडिताइन अकेले ही रहती हैं । अभी दो मास माह पहले ही घर से बिटिया को विदा किया है, घर में फूटी कौड़ी शेष नहीं। बिटिया के विवाह में बंधु - बांधवों ने सहायता की। फटी लुगरी में पंडिताइन व फटा कुर्ता तिवारी जी का मानो कुल कमाई शेष हो।
एक बड़ी प्रतिष्ठा उनके नाम की थी । अभावग्रस्त व्यक्ति भी उसी प्रमुदित भावों से उनके पास धार्मिक कार्यों को संपादित कराता जिस भाव से धन्ना सेठ। लेकिन कमाई कुल उतनी ही जितने में बमुश्किलन पेट भर सकें।
संतोषी ब्राह्मण राष्ट्र की समृद्धि का प्रतीक है लेकिन ब्राह्मण दरिद्रता को प्राप्त हो जाए तो पूरा समाज ही विचारणीय हो जाता है । पंडित जी के पेट पर वैश्विक महामारी ने जो लात मारा है, उसको देखकर शायद विधाता का भी हृदय पसीज जाए ।सरकारी नौकरी को कोई तवज्जो न देने वाले पंडित जी के घर पर पिछले पांच दिन से चूल्हा नहीं जला है।
ब्राह्मण की असहनीय दशा/Unbearable condition of Brahmin
क्षुधा से पीड़ित होकर उन्होंने पंडिताइन की वह चांदी की हँसुली बेंच डाली, जो सास की एक मात्र धरोहर थी। उससे प्राप्त पैसे से सब्जी खरीदकर दूर मोहल्ले में बेचने चल पड़े और वेश ऐसा बनाया की आसानी से पहचान में न आवें।
जिनके वेद मंत्रों से बड़े-बड़े अनुष्ठानों का आयोजन आरंभ होता था, आज वह घर घर में सब्जी खरीदने की याचना कर रहे थे। अस्वीकार करने पर कातर निगाहों से आसमान की ओर देखते।
पंडित जी इसी क्रम में मेरे घर पर सब्जी के लिए आवाज दी। पत्नी उनसे सब्जी लेने के बाद कम दाम को लेकर मोलभाव करने लगी। पंडित जी सब्जी बेचने के क्षेत्र में तो अनाड़ी ही अनाड़ी ही थे ,उन्होंने बेबस आवाज से कहा कि बहू जो उचित समझो, वह दे दो।
पत्नी पढी लिखी स्नातक थी। उसने भाषा शैली से यह समझ लिया कि यह कोई विद्वान व्यक्ति हैं जो विवशतापूर्वक सब्जी बेंच रहे हैं। उसने अंदर आकर मुझे बताया कि कोई भले व्यक्ति मजबूरी से सब्जी बेंच रहे हैं। मैं उसके बाद सुनकर जैसे ही द्वार पर आया तो मैं पंडित जी को देख कर चौक गया और पंडित जी मुझे देखकर नजरें चुराने लगे ।
(आपका प्रिय लेख "छुआछूत की बीमारी कोरोना वायरस" तथा "स्त्री रूप में पूजे जाते हैं हनुमानजी" अवश्य पढें। एवं कमेण्टबाक्स मे अपनी राय/प्रतिक्रिया देते हुए शेयर भी जरूर करें।)
मेरा उनके प्रति गुरु भावना थी, इसलिए चरण पकड़ कर सम्मान पूर्वक अंदर बैठाया। मैंने इस स्थिति का कारण पूछा तो वह मुझसे लिपट कर फफक कर रो पड़े ।
जिनके सामने मुझे खड़े होने में भी संकोच होता है, उनका यह रूप मुझे असहज कर गया।
पिछले 5 दिन से पंडित जी का घर दाने दाने को तरसा गया है। घर में एक गाय है , कहीं बिना खाये पिये ही खूंटे पर ही प्राण न छोड़ दे सो रस्सी खोल दी पर गाय तो माता होती है न! खूंटा खुलने पर भी दर न छोड़ा।
विद्वता की साक्षात प्रतिमूर्ति की यह दशा सहन करने योग्य न थी। उनके सैकड़ों शिष्य कर्मकांड के भरोसे विविध शहरों में जीविका यापन करते हैं। पंडित जी ने बताया कि वह सभी इसी दशा को प्राप्त हो रहे या प्राप्त हो चुके हैं।
कोरोना ने तो ऐसी लात ब्राह्मणों के पेट पर मारी है कि वह असहाय हो गए हैं। आत्मसम्मान के चलते वह दूसरा कार्य नहीं कर सकते, उनका पारंपरिक कार्य पर तो महीनों से ग्रहण लग चुका है पता नहीं यह कब तक जारी रहेगा ...!
मैंने पंडित जी को भोजन कराया व उनके तथा पंडिताइन के लिए 2 जोड़ी कपड़े दिए। 1 मास का अनाज घर भेज दिया और कहा कि हर स्थिति में हम आपके साथ रहेंगे लेकिन आप सब्जी मत बेंचिये।
सामर्थ्य के अनुसार दक्षिणा देकर विप्र देवता को विदा किया । उनके जाते ही उन लाखों कर्मकांड ब्राह्मणों के बारे में यह सोचने लगा कि हाय उनका घर कैसे चलता होगा??
क्या समाज इतना निष्ठुर बन चुका है कि समाज के पथ प्रदर्शकों को भूखे पेट छोड़ देगा ??
विप्र देवता के सम्मान में नाम परिवर्तित कर दिया गया है और पता का उल्लेख नहीं किया है।
इस पोस्ट का ध्येय मात्र इतना है कि आप यह ध्यान दें, कहीं आपके आस पास भी कोई ब्राह्मण भूखा तो नहीं है।
(यह संकलित कहानी सत्य घटनाओं पर आधारित है।)
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आपका अपना - पं0 रमाकान्त मिश्र
कोइरीपुर सुलतानपुर
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