प्रिय मित्रों जय श्रीकृष्णा, राधे राधे.....

नसीब अपनाअपना

           धनराज एक लिमिटेड कम्पनी मे नौकरी करता था जहा मजदूरों से बेगारी ज्यादा खटाई जाती थी। कभी पगार मिलती थी तो कभी नही मिलती। इस तरह धनराज बच्चो सहित परिवार का पालन पोषण करने मे अपने को असमर्थ पाता था। ऊबकर वह नौकरी छोडकर कुछ कर्ज लेकर एक छोटी सी दूकान कर लिया। जिससे उसे कुछ नियमित पैसा दूकान से मिलने लगा।


नसीब अपना अपना


           धनराज दूकान तो कर लिए किन्तु एक कहावत उन पर चरातार्थ हुई कि बडी मछली छोटी मछली को निगल जाती है उसी तरह बडी पूँजी वाली दूकान के सामने छोटी पूँजी वाली दूकान चल नही पाती।   जिसके चलते धनराज सदैव परेशान रहता।  

             उसके बच्चे पढ लिख रहे थे और धनराज भी चाहता था कि उसके बच्चे पढ लिखकर कोई बढिया नौकरी पा जाए। इस तरह धनराज दूकान से ज्यादा कमाई न होने के कारण दूकान मे लगी पूँजी भी खर्च कर देता। दूकान होने के कारण लोगो से उसकी जान पहचान भी हो गयी थी जिससे जरूरत पडने पर  उसे कर्ज के रूप में पैसा लोगो से आसानी से मिल जाया करता था।


नसीब अपना अपना


        धनराज लोगो से पैसा लेता था दूकान करने के लिए लेकिन उसकी एक सोच थी कि मेरे बच्चों को कभी महसूस न होने पाये कि मेरा बाप आर्थिक तंगी मे रहने के कारण हम लोगो की परवरिश कायदे से नही कर सका।

       धनराज हमेशा यही सोचता रहता कि हमारे बच्चों को कोई तकलीफ न पडने पाए तथा पढ लिखकर कुछ बन जाए। कर्ज ही रहेगा तो बच्चे नौकरी पा जाएगे सब अदा हो जाएगा।

            इस तरह धीरे धीरे कर्ज बढता जा रहा था। अच्छा इतना ही था कि धनराज जो भी कर्ज लेता था उस पैसे का व्याज नही देना होता है। 

            समय बीतता गया उसी समय मे लडकी की शादी भी पड गयी। लडकी की शादी मे कर्ज और बढ गया। शादी के लगभग 18 महीने बाद धनराज के दो बच्चो की नौकरी एक  ही साथ  लग गयी। एक लडका राजस्व निरीक्षक के पद पर तो दूसरा रेलवे मे लिपिक के पद पर चयनित होकर नौकरी करने लगे।

         जब बच्चे नौकरी पा गये तो जो लोग धनराज को कर्ज दिए थे सभी लोगो ने कर्ज के पैसे की वापसी के लिए दबाव बनाने लगे। लेकिन बच्चे कर्ज का पैसा देने से आनाकानी करने लगे। जिससे धनराज के सामने इज्ज्त और सम्मान बचाने का प्रश्न खडा हो गया।

    जब तगादा ज्यादा होने लगा लोग धनराज को लज्जित करने वाले शब्दो को कहने लगे तो धनराज बच्चों पर दबाव बनाए कि जो कर्ज हो गया है वह पैसा लौटा दो नही तो मैं समाज मे जो इज्ज़त मर्यादा बनाया हूँ सब चली जाएगी और मै चेहरा कहाँ और कैसे दिखाऊँगा। इस पर एक बच्चा बोला कि सब पैसा कहाँ खर्च किए है लिखे हैं कि नहीं। कर्ज ही दिया जाएगा कि शादी विवाह भी होगा।

        दूसरा बोला कि इतना कर्ज  इस आशा पर कैसे कर लिए कि बच्चो को नौकरी मिल ही जाएगी। इतना बडा विश्वास कैसे कर लिए। इतना सबकुछ सुनकर धनराज चुप रह गया। मन ही मन समझ गया कोई कुछ भी देने वाला नही है, अतः मन मारकर जीने लगा।

        फिर भी धनराज एक दिन बोले कि बेटा हमे पूर्ण विश्वास था कि मेरे सभी बच्चे नौकरी अवश्य पा जाएंगे। मै हमेशा ईश्वर पर आस्था एवं विश्वास करते हुए लोगो की सदैव मदद किया हूँ। कभी किसी को परेशान नही किया हूँ और न ही कभी किसी की मदद के बदले उससे कुछ लिया हूँ। निःस्वार्थ ढंग से लोगो की मदद किया हूँ भले ही मै आर्थिक तंगी झेलता रहा हूँ इसलिए हमे पूर्ण विश्वास था कि भगवान हमारे सभी बच्चों को नौकरी अवश्य देगा। आज भगवान हमारी मनोकामना पूर्ण भी कर दिया। लेकिन बच्चे न कुछ जवाब दिए और न ही कर्ज के पैसे ही वापस किए।

         एक दिन पुनः एक तगादा वाला आया और कुछ कहने लगा तो धनराज  की पत्नी बच्चों से कहने लगी कि भैया सबका पैसा वापस कर दो सब पापा को बहुत कुछ कहते सुनते है। सोचते सोचते उन्हे कुछ हो गया तो तब क्या होगा। इसी बात पर एक लडका बोल उठा कि "बोला मत नाही तो जनतू नाइ, अबहा लागे तो चुप होइ जाबू," इस पर धनराज बच्चे को बोल उठे कि "सीधे बोलो, जबान सम्भालकर" तो वह लडका धनराज को भी कहने लगा कि "चुप रहा नाही तो अबहा तोहऊ  के बताउब"।

         उसी दिन से बाप बेटे मे बोलचाल बन्द हो गयी और धनराज कही छोटी मोटी नौकरी के लिए जब किसी से सिफारिश करता है तो लोग कहते है दो बच्चे कमा रहे है अब पैसा क्या करोगे। धनराज भी बैठे बैठे सोचते रहते है कि लोगो से कैसे बताए कि हमे नौकरी की क्या आवश्यकता है।

        धनराज पर एक फिल्मी गाने के बोल सटीक लागू हो रहे है...

"तेरी बेवफाई का शिकवा करूँ तो ये मेरी मुहब्बत की तौहीन होगी।"
   
    जब कभी किसी सेे धनराज अपने लिए नौकरी के लिए कुछ कहते तो निराशा बराही जवाब मिलता था........ 
इसी को कहते है कि *नसीब अपना अपना*


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आपका अपना - पं0 रमाकान्त मिश्र
                  कोइरीपुर सुलतानपुर