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रूप दर्शन
रूपदर्शन
प्रिय मित्रों जय श्रीकृष्णा, राधे राध
घूँघट उठा दीदार हुआ चाँद का।
छलक उठी बोतल शराब की।।
दांत दिखें बिजली आषाढ़ सी।
अधर लग रहा मधुमास की।।
आँखो में सागर था प्यार का।
पहरा था चितवन में लाज का।।
बस *विकल* उठी पालकी।
इतनी कहानी थी आज की।।
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आपका अपना -पं0 रमाकान्त मिश्र
कोइरीपुर सुल्तानपुर


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