प्रिय मित्रों जय श्री कृष्णा

सुविचार

*हमारा 'लोभ' और 'अहंकार' -- हमारे सबसे बड़े शत्रु हैं; हमारी 'भक्ति' और 'सत्यनिष्ठा' -- हमारे सबसे बड़े मित्र हैं*


*जीवन में जरा सी भी आध्यात्मिक प्रगति के लिए शत-प्रतिशत अनिवार्य आवश्यकता 'भक्ति' अर्थात परमात्मा के प्रति परमप्रेम है*


*"मिलहिं न रघुपति बिनु अनुराग, किए गए जोग, तप, ज्ञान विरागा।" दूसरी आवश्यकता -- सत्यनिष्ठा है।*


*यदि कोई भक्ति और सत्यनिष्ठा हमारे में है, तो बाकी सभी सगुण हमारे सामने स्वत: आ जाएं।* 

सुविचार

* हम क्या सोचते हैं और लोग साथ कैसे रहते हैं, इसका सबसे बड़ा प्रभाव हमारे ऊपर है। जैसे लोगों के साथ रहेंगे, ठीक वैसे ही हमारा नजरिया हो जाएगा, और वैसे ही हम हो जाएंगे। यही सत्संग की महिमा है।*


*"महत्संगस्तु दुर्लभोऽगम्योऽमोघश्च" -- यानी महापुरुषों का संग दुर्लभ, अग्म्य तथा अमोध है। इसलिए हमें सर्वदा सत्संग करना चाहिए।*


*संगति का प्रभाव नहीं रहता। हमारा जैसा अंदिया होता है, यानी जैसा हम भी वैसे ही बन जाते हैं।*


*योगसूत्रों में एक सूत्र आता है -- "वीतराग विषयं वा चित्तः"।*

* अर्थात् - किसी वीतराग व्यक्ति का निरंतर ध्यान हमारे चित्त को भी वीतराग (राग-द्वेष-अहंकार से परे) है।*

सुविचार

* किसी भी हालत में कुसंग का त्याग करना चाहिए। "दुसङ्गः सर्वथैव सत्यज्यः" -- क्योंकि कुसंग से ही काम, क्रोध, मोह, स्मृतिभ्रंश, बुद्धिनाश और अंततः सर्वनाश हो जाता है। "कामरोधमोहस्मृतिभ्रंशबुद्धिनाशकारणत्वात्"। जो पतनोन्मुख है, और जो गलत लोगों का संग करता है, उसे साथ छोड़ देना चाहिए, चाहे वह स्वयं का गुरु ही क्यों ना हो।*


*परमात्मा हमारे पिता हैं, तो माता भी हैं। रात में परमात्मा का वातावरण करते हैं उसी तरह सोयें जैसे एक छोटा बालक निश्चिंत होकर अपनी मां की गोद में सोता है। दिन की शुरुआत भगवान के ध्यान से करें और पूरे दिन उन्हें अपनी स्मृति में रखें। हमारे बारे में कौन क्या कहता है और क्या सोचता है, यह उसकी समस्या है, हमारी नहीं। इस पर थोड़ा सा विचार करें।* 


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आपका अपना -पं0 रमाकान्त मिश्र
                  कोइरीपुर सुल्तानपुर