प्रिय मित्रों जय श्रीकृष्णा, श्री राधे-राधे 


रुद्र का अर्थ है भूतभावन शिव का अभिषेक


शिव और रुद्र एकता एक दूसरे के पर्यायवाची हैं। 

        शिव को ही रुद्र कहा जाता है, क्योंकि-- "रुतम-दु:खम्, द्रावयति-नाशयतीतिरुद्र:" अर्थात भोले सभी दु:खों को नष्ट कर देते हैं, धर्मग्रंथों के द्वारा हमारे द्वारा पाप गाए गए हैं हमारे दु:खों के कारण हैं।

         रुद्रार्चन और रुद्राभिषेक से हमारे कुंडल से पातक कर्म और महापातक भी जलकर भस्म हो जाते हैं और साधक में शिवत्व का उदय होता है और भगवान शिव का शुभाशीर्वाद भक्त को प्राप्त होता है और उनके सभी मनोरथ पूर्ण होते हैं।
ऐसा कहा जाता है कि एकमात्र सदाशिव रुद्र की पूजा सभी देवताओं की पूजा से होती है: रुद्रहृदयोपनिषद में शिव के बारे में कहा गया है---     
              "सर्वदेवात्मको रुद्र: सर्वे देवा: शिवात्मक:"
अर्थात् सभी देवताओं की आत्मा में रूद्र देवता हैं और सभी देवताओं में रूद्र की आत्मा हैं।
रुद्र अभिषेक की स्थापना के लिए विभिन्न शास्त्रों में रुद्र अभिषेक के निमित्त से लेकर अनेक द्रव्यों और पूजन सामग्री का वर्णन किया गया है। की जाती है, रुद्राभिषेक के विभिन्न पूजन के लाभ -----  


रुद्र का अर्थ है भूतभावन शिव का अभिषेक


 जल से अभिषेक करने पर वर्षा होती है।          
असाध्य आचार्य को शांत करने के लिए कुशोदक से रुद्रअभियंबन।         
         भवन-वाहन के लिए करें दही से रुद्राभिषेक।
लक्ष्मी प्राप्ति के लिए रक्षाबंधन के रस से रुद्राभिषेक करें।
धन-वैभव के लिए शहद एवं घी से अभिषेक करें।
तीर्थ के जल से अभिषेक करने पर मोक्ष की प्राप्ति होती है।
तेल मिले जल से अभिषेक करने से रोग नष्ट हो जाता है।
पुत्र प्राप्ति के लिए दुग्ध से और यदि संतति उत्पन्न मृत हो तो गोदुग्ध से रुद्र रुद्राभिषेक करें।

          रुद्र अभिषेक एसोसिएशन और विद्वान संत की प्राप्ति होती है।
ज्वार की शांति के लिए शीतल जल/गंगाजल से रुद्राभिषेक करें।
सहस्रनाम-मंत्रों का उच्चारण करते हुए घृत की धारा से रुद्राभिषेक करने पर वंश का विस्तार होता है।
प्रमेह रोग की शांति भी दुग्धाभिषेक से होती है।
शक्रिक मिले दूध से अभिषेक करने पर जड़बुद्धि वाला भी विद्वान हो जाता है।
शहद के द्वारा अभिषेक करने पर यक्ष्मा (टेपेडिक) दूर हो जाता है।
भोलेनाथ से भी करें रुद्र भगवान का अभिषेक।
गो दुग्ध से तथा शुद्ध घी से अभिषेक करने से आरोग्यता प्राप्त होती है।
पुत्र की चाहत वाले व्यक्ति को व्यक्तिगत रूप से मिश्रित जल से अभिमंत्रित करें। 
ऐसे तो अभिषेक साधारण रूप से जल से ही होता है।
विशेष अवसर पर या सोमवार, प्रदोष और शिवरात्रि पर्व आदि के दिनों में मंत्र गोदुग्ध या अन्य दूध मिला कर या केवल दूध से भी अभिषेक किया जाता है।





विशेष पूजा में दूध, दही, घृत, शहद और चीनी से अलग-अलग या सभी को पंचामृत से भी अभिषेक किया जाता है, तंत्रों में रोग निवारण उपायों से लेकर अन्य विभिन्न मंत्रों से भी अभिषेक किया जाता है।
इस प्रकार की विभिन्न विविधताएँ अभीष्ट कामनाएँ हैं।
इसमें कोई संदेह नहीं है कि किसी भी पुराने नियमित रूप से पूजा करने वाले से बहुत ही शीघ्र फल मिलता है, यदि पारद के दर्शन का अभिषेक किया जाता है तो बहुत ही शीघ्र चमत्कारिक शुभ फल मिलता है, रुद्र अभिषेक का बहुत ही शीघ्र फल मिलता है होता है, विद्वान ने इसकी भूरि-भूरि प्रशंसा की है।

              



             पुराणों में सम्मिलित अनेक मिथकों का विवरण प्राप्त होता है
पुराणों में बताया गया है कि रावण ने अपने दसियों सिरों को रक्त से यज्ञ करके भस्म कर दिया था और सिरों को अग्नि में निहत्था कर दिया था, जिससे वो त्रैलोक्यजयी हो गया था।
जब भस्मासुर ने शिव लिंग का अभिषेक किया तो वह भी भगवान के आभूषण का पात्र बन गया।

रुद्र का अर्थ है भूतभावन शिव का अभिषेक



रुद्र अभिषेक करने की तिथियाँ कृष्ण पक्ष की- प्रतिपदा, चतुर्थी, पंचमी, अष्टमी, ब्रह्माण्ड, द्वादशी, निष्क्रिय। 

शुक्ल पक्ष की- द्वितीया, पंचमी, षष्ठी, नवमी, द्वादशी, त्रयोदशी तिथियों में अभिषेक करने से सुख-समृद्धि संतान प्राप्ति एवं ऐश्वर्या प्राप्त होती है।
कालसर्प योग, गृहकलेश, व्यापार में हानि, शिक्षा में सभी प्रकार के बच्चों को दूर करने के लिए रुद्राभिषेक आपके लिए अभीष्ट सिद्धि के लिए फलदायक है।
किसी की इच्छा से जाने वाले रुद्र अभिषेक में शिव-वास का विचार करने पर अनुष्ठान सफल होता है और मनोवांछित फल प्राप्त होता है।
प्रत्येक मास के कृष्ण पक्ष की - "प्रतिपदा, अष्टमी, अष्टमी" तथा शुक्ल पक्ष की - "द्वितीया व नवमी तिथि" के दिन भगवान शिव माता गौरी के साथ होते हैं। इस तिथि में रुद्राभिषेक से सुख-समृद्धि उपलब्ध है।

कृष्ण पक्ष की--"चतुर्थी, तृतीया" और शुक्ल पक्ष की-"पंचमी और द्वादशी तिथियों" में भगवान शंकर कैलाश पर्वत पर होते हैं और उनके अनुकंपा से परिवार में आनंद-मंगल होता है।

कृष्ण पक्ष की--"पंचमी, द्वादशी" तथा शुक्ल पक्ष की-"षष्ठी व त्रयोदशी तिथियों" में महादेव नंदी सवार होकर पूरे विश्व में भ्रमण करते हैं।
अत: इन तिथियों में रुद्र अभिषेक करने पर अभीष्ट सिद्ध होता है।

कृष्ण पक्ष की- "सप्तमी, चतुर्दशी" तथा शुक्ल पक्ष की- "प्रतिपदा, अष्टमी, पूर्णिमा तिथि" में भगवान महाकाल श्मशान में समाधिस्थ रहते हैं।

अतएव इन तिथियों में किसी मन की सूची के लिए जाने वाले रुद्राभिषेक में प्रार्थना करने पर उनकी साधना भंग होती है जिससे अभिषेककर्ता पर विपत्ति आ सकती है।

कृष्ण पक्ष की- "द्वितीया, नवमी" और शुक्ल पक्ष की- "तृतीया व दशमी तिथि" में महादेव भगवान की सभा में उनके विचार रखे गए हैं।
इन तिथियों में सकाम अनुष्ठान करने से संताप या दुख होता है।

कृष्ण पक्ष की - "तृतीया, दशमी" तथा शुक्ल पक्ष की - "चतुर्थी व चतुर्थी तिथि" में सदाशिव कृतरात रहते हैं।
इन तिथियों में सकाम रुद्रार्चन संत की विशेष जानकारी प्रदान की गई है।

कृष्ण पक्ष की--"षष्ठी, त्रयोदशी" तथा शुक्ल पक्ष की- "सप्तमी व चतुर्दशी तिथि" में रुद्रदेव भोजन करते हैं।
इन तिथियों में भगवान से अलग हो गए थे रुद्र की आराधना।


रुद्र अर्थात् भूतभावन शिव का अभिषेक


ज्योतिर्लिंग - क्षेत्र एवं तीर्थस्थान में तथा शिवरात्रि-प्रदोष, श्रावण के सोमवार आदि पर्व में शिव-वास का विचार भी बिना रुद्राभिषेक के किया जा सकता है।
वस्तु: अभिषेक का आह्वान आशोषण शिव को शीघ्र ही साधारणजनों को उनके प्रार्थना पात्र दिए जाते हैं और उनका सारा साज-सज्ज स्वयं समाप्त हो जाता है।
रुद्र अभिषेक से मनुष्य के सारे पाप-ताप मिल जाते हैं।
स्वयं सृष्टिकर्ता ब्रह्मा ने भी कहा है कि "जब हम अभिषेक करते हैं तो स्वयं महादेव साक्षात उस अभिषेक को ग्रहण करते हैं।"
संसार में ऐसी कोई वस्तु, वैभव, सुख नहीं है जो हमें रुद्राभिषेक या अभिषेक से प्राप्त नहीं हो सकता।


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आपका अपना - पं0 रमाकांत मिश्र
                     कोइरीपुर सुल्तानपुर